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Essay on the Business Economist | Hindi | Economics

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Here is an essay on the ‘Business Economist’ for class 9, 10, 11 and 12. Find paragraphs, long and short essays on the ‘Business Economist’ especially written for school and college students in Hindi language.

Essay on Business Economist


Essay Contents:

  1. व्यावसायिक अर्थशास्त्री का अर्थ  (Meaning of Business Economist)
  2. व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कार्य (Functions of Business Economist)
  3. व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कर्त्तव्य (Duties of a Business Economist)
  4. व्यावसायिक अर्थशास्त्री के उत्तरदायित्व (Responsibilities of a Business Economist)
  5. व्यावसायिक अर्थशास्त्री की भूमिका एवं महत्व (Role and Importance of Business Economist)


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Essay # 1. व्यावसायिक अर्थशास्त्री का अर्थ  (Meaning of Business Economist):

शब्दार्थ में व्यावसायिक अर्थशास्त्र के ज्ञाता को व्यावसायिक अर्थशास्त्री कहते हैं लेकिन इस परिभाषा से व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कार्य और उसके दायित्वों का पूरा ज्ञान नहीं होता है । वस्तुतः एक व्यावसायिक अर्थशास्त्री किसी संस्था का वह अधिकारी होता है जो कि सर्वोच्च प्रबन्ध को आर्थिक मामलों पर परामर्श देने हेतु नियुक्त किया जाता है ।

प्रबन्ध के ज्ञान की आवश्यकता विभिन्न देशों में बढ़ती जा रही है जिसके कारण विभिन्न व्यावसायिक एवं गैर-व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में प्रबन्धकीय दक्षता रखने वाले अर्थशास्त्रियों का महत्व एवं दायित्व बढ़ रहा है ।

प्रबन्धकीय दक्षता रखने वाला अर्थशास्त्री अपने विशेष ज्ञान के द्वारा सही निर्णयन एवं भावी नियोजन की जटिल समस्याओं को हल कर सकता है । अतः जो व्यक्ति निर्णयन (Decision-Making) तथा भावी नियोजन (Forward Planning) के निर्माण में मदद करता है, ‘व्यावसायिक अर्थशास्त्री’ कहलाता है ।

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प्रबन्ध का एक महत्वपूर्ण कार्य निर्णय लेना है तथा निर्णय को सही रूप में क्रियान्वित करने में मदद करना है । पीटर ड्रकर के अनुसार, ”प्रबन्धक जो कुछ भी करता है, निर्णयों के द्वारा ही करता है ।” यह सभी जानते हैं कि प्रबन्धकों को दिन-प्रतिदिन अनेक कार्य करने पड़ते हैं और इन कार्यों को करने के लिए उनके पास अनेक विकल्प होते हैं ।

इन विकल्पों में से सर्वोत्तम विकल्प कौन-सा है ? इसको निश्चित करना ही ‘निर्णयन’ है । टैरी ने इस सम्बन्ध में यह कहा है कि ”प्रयम्बकों का जीवन ही निर्णय लेना है ।” इन्होंने आगे कहा है कि ”यदि प्रबन्धक की कोई सार्वभौमिक पहचान है, तो वह उसका निर्णय लेना । निर्णय प्रबन्ध के सभी कार्यों – नियोजन, संगठन, निर्देशन, नियन्त्रण आदि के अन्तर्गत सम्मिलित है ।”

साइमन का यह विचार कि ‘निर्णय लेना’ ही प्रबन्ध है, बहुत उचित प्रतीत होता है । साइमन के विचार से कोई सहमत हो अथवा न हो परन्तु यह निर्विवाद सत्य है कि निर्णय ही व्यवसाय का मुख्य आधार है । आज निर्णय का महत्व इसलिए और भी बढ़ गया है, क्योंकि प्रबन्धकों की क्षमता एवं सफलता का माप उनके द्वारा लिये गये निर्णयों से ही निश्चित होता है ।

निर्णय लेने में और भविष्य के लिए नियोजन करने में व्यावसायिक अर्थशास्त्री नियुक्त किये जाते हैं और उनकी सेवाएँ निर्णयकर्ता को उपलब्ध करायी जाती हैं । विकसित राष्ट्रों में व्यावसायिक अर्थशास्त्री को एक पेशेवर व्यक्ति माना जाता है । अपने देश में भी व्यावसायिक अर्थशास्त्री की आवश्यकता को समझा जाने लगा है । व्यावसायिक अर्थशास्त्री की उपयोगिता निरन्तर बढ़ती जा रही है ।


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Essay # 2. व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कार्य (Functions of Business Economist):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री किसी व्यावसायिक संस्था का एक महत्वपूर्ण अधिकारी होता है ।

व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कार्यों को दो स्तरों पर विभक्त किया जा सकता है:

I. बौद्धिक कार्य

II. चयन कार्य

दोनों कार्यों की व्याख्या नीचे दी गयी है:

I. बौद्धिक कार्य (Thinking Functions):

(i) समस्या की जानकारी करना ।

(ii) समस्या के सभी पहलुओं का अध्ययन करना ।

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(iii) समस्या का सरल रूप में प्रस्तुतीकरण करना ।

(iv) समस्या के हल का उपयुक्त समय निर्धारित करना ।

(1) संकल्पन (Conception):

समस्या के सम्बन्ध में हुए प्रत्यक्ष ज्ञान से विचारों का विकास इस अवस्था में होता है ।

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इस स्थिति में निम्न कार्य आते हैं:

(i) समस्या हल के विभिन्न विकल्पों को सोचना, तथा

(ii) विभिन्न विकल्पों का मूल्यांकन करना ।

(2) खोज (Investigation):

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विकसित विचारों के सम्बन्ध में तथ्यों का अन्वेषण किया जाता है । समस्या की जानकारी के बाद उसके हल के लिए साधन खोजे जाते हैं ।

इस प्रक्रिया में निम्न कार्य आते हैं:

(i) समस्या हल के लिए साधनों की खोज करना, तथा

(ii) समस्या के हल में आने वाली रुकावटों का पता लगाना ।

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II. चयन कार्य (Selection Functions):

समस्या पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने के बाद एक व्यावसायिक अर्थशास्त्री उसके समाधान के लिए सर्वोत्तम विकल्प का चयन करता है । किसी भी समस्या को हल करने के लिए बहुत-से तरीके हो सकते हैं लेकिन समस्या का समाधान अल्प साधनों में शीघ्र हो जाये, ऐसा विकल्प चुनना व्यावसायिक अर्थशास्त्री का बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य है ।

फिर समस्या का समाधान ऐसा हो जो सम्बन्धित सभी पक्षों के अनुकूल हो । कोई भी पक्ष उसका विरोध न करे ऐसा और भी कठिन हो जाता है । उदाहरण के लिए, संस्था की समस्या ‘उत्पादन बढ़ाने’ की है । उत्पादन बढ़ाने के दो विकल्प हो सकते हैं ।

पहला, मशीनीकरण द्वारा; तथा दूसरा, अधिक श्रमिक लगाकर । यदि पहले विकल्प का चयन किया जाय तो मालिक इसका समर्थन करेंगे क्योंकि लागत कम होगी तथा उत्पादन बढ़ेगा लेकिन श्रमिक वर्ग इसका विरोध करेगा क्योंकि इससे बेरोजगारी बढ़ेगी ।

दूसरे विकल्प का श्रमिक समर्थन करेंगे लेकिन मालिक विरोध कर सकते हैं, यदि उत्पादन वृद्धि के साथ लागत में भी वृद्धि होती है । अतः व्यावसायिक अर्थशास्त्री को ऐसे किल्प को चुनना है जिसमें न तो लागत बढ़े और न ही बेरोजगारी बढ़े । यदि ऐसा करने में वह सफल हो जाता है तो वह एक कुशल अर्थशास्त्री माना जायेगा । समाज में उसका स्तर आदर की दृष्टि से देखा जायेगा ।

उपर्युक्त कार्यों के अतिरिक्त वर्तमान में बहुत-से विद्वानों ने व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कुछ और विशेष कार्यों को तीन भागों में बाँटा है:

विशिष्ट कार्य (Specific Functions):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कुछ विशिष्ट कार्य होते हैं ।

श्री एच. आई. एन्साफ (H. I. Ansoff) ने विशिष्ट कार्यों को तीन भागों में बाँटा है:

(1) व्यूह-रचना सम्बन्धी कार्य (Strategic Functions):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री को इन कार्यों के अन्तर्गत संगठन के उद्देश्यों की पूर्ति, साधनों के उपयोग हेतु दीर्घकालीन योजनाओं का निर्माण तथा उपलब्ध अवसरों और बाहरी वातावरण के कारण उत्पन्न रुकावटों के अनुरूप अपने साधनों को समायोजित करने का प्रयास करना पड़ता है ।

(2) प्रशासन सम्बन्धी कार्य (Administrative Functions):

इन कार्यों के अन्तर्गत संगठन के ढाँचे में सुधार करने, अधिकार एवं उत्तरदायित्व में समन्वय, प्रभावपूर्ण संचार व्यवस्था तथा साधनों को जुटाने सम्बन्धी निर्णय लेने पड़ते हैं ।

(3) कार्य-संचालन सम्बन्धी कार्य (Operating Functions):

कार्यात्मक निर्णयों में दैनिक या प्रतिदिन से सम्बन्धित निर्णय होते हैं । ये निर्णय भी दो प्रकार के होते हैं । पहले, दैनिक होते हैं जो व्यवसाय की सामान्य प्रकृति में लिये जाते हैं तथा इनके लिए कम सोच-विचार की आवश्यकता होती है । दूसरे, निर्णय आधारभूत होते हैं जो कि काफी सोच-विचार के पश्चात् लिये जाते हैं ।

अतः एक व्यावसायिक अर्थशास्त्री का कार्य-क्षेत्र काफी व्यापक होता है । वह समुचित सांख्यिकी अभिलेख भी तैयार करता है ।

इंग्लैण्ड में व्यावसायिक अर्थशास्त्री के विशिष्ट कार्यों का सर्वेक्षण करने के बाद सर्वश्री के. जे. डब्ल्यू. एलैक्जेण्डर तथा एलैक्जेण्डर जी. केम्प ने निम्नांकित कार्यों को प्रतिपादित किया है:

(1) विक्रय पूर्वानुमान (Sales Forecasting)

(2) औद्योगिक बाजार शोध (Industrial Market Research)

(3) प्रतियोगी फर्मों का आर्थिक विश्लेषण (Economic Analysis of Competitive Companies)

(4) उद्योग की मूल्य समस्याएँ (Pricing Problems of Industry)

(5) पूँजीगत परियोजनाएँ (Capital Projects)

(6) उत्पादन कार्यक्रम बनाना (Production Programming)

(7) प्रतिभूति, विनियोग, विश्लेषण तथा पूर्वानुमान (Security, Investment, Analysis and Forecasting)

(8) व्यापार और जन-सम्पर्क सम्बन्धी सलाह देना (Advice on Trade and Public Relations)

(9) कच्चे माल के सम्बन्ध में सलाह देना (Advising on Primary Commodities)

(10) विदेशी विनिमय के सम्बन्ध में सलाह देना (Advising on Foreign Exchanging)

(11) कृषि का आर्थिक विश्लेषण (Economic Analysis of Agriculture)

(12) अल्प-विकसित अर्थव्यवस्थाओं का विश्लेषण करना (Analysing Under-Developed Economies), तथा

(13) वातावरण सम्बन्धी पूर्वानुमान लगाना (Environmental Forecasting) |

इन कार्यों को देखने से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि व्यावसायिक अर्थशास्त्री का कार्य-क्षेत्र इन विद्वानों ने बहुत ही व्यापक बना दिया है ।

पीटर ड्रकर ने विकल्पों का चयन करने के लिए कुछ आधार बताये हैं । उन आधारों के अनुसार एक व्यावसायिक अर्थशास्त्री विशिष्ट कार्य साधनों में मितव्ययिता तथा हानि की जोखिमों को कम करता है ।

इस प्रकार एक व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कार्य बहुत व्यापक हैं, वह उद्योगों तथा व्यावसायिक संस्थानों के लिए ही कार्य नहीं करता, बल्कि समाज एवं सरकार को भी अपने व्यावहारिक ज्ञान द्वारा आर्थिक समस्याओं के हल हेतु सुझाव देता है तथा उनको क्रियान्वयन में मदद करता है ।


Essay # 3. व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कर्त्तव्य (Duties of a Business Economist):

एक व्यावसायिक अर्थशास्त्री का मुख्य कर्त्तव्य विभिन्न दायित्वों का निभाना है ।

विभिन्न पक्षों के प्रति व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कर्त्तव्य निम्नलिखित हैं:

(1) उद्देश्यों का निर्धारण (Setting of Objectives):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री को अपने कर्त्तव्यों के सम्बन्ध में यह जानना व समझना आवश्यक है कि समस्या को सुलझाने के लिए उसे किस क्रम को अपनाना है । सर्वप्रथम तो उसे उद्देश्यों का निर्धारण करना पड़ेगा । किसी भी संस्था के कुछ उद्देश्य होते हैं जिन्हें पूर्ण करना संस्था की सफलता माना जाता है ।

समय तथा साधनों की कमी के कारण सभी उद्देश्यों की पूर्ति नहीं हो पाती । अतः प्राथमिकता का निर्धारण करना व्यावसायिक अर्थशास्त्री का सबसे पहला कर्तव्य है । इस कर्त्तव्य के निर्वाह पर ही उसकी आगे की सफलता निर्भर है ।

(2) समस्या का विश्लेषण (Analysing the Problem):

वसायिक अर्थशास्त्री का कर्तव्य है कि वह समस्या का विश्लेषण करे और उसे समझे, इससे समस्या के हल में आसानी होती है । अतः समस्या के विश्लेषण के अन्तर्गत सम्बन्धित तथ्यों को भी एकत्रित करना पड़ता है ।

(3) व्यापारिक जोखिमों को कम करना (To Reduce the Risk of Business):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री का सबसे पहला कर्त्तव्य है कि वह अपनी योग्यता से व्यापारिक जोखिमों को कम करे । व्यापार में निहित जोखिमों को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता क्योंकि वह कोई भी व्यापार अनिश्चितता के वातावरण में चलता है । अनिश्चितता के साथ जोखिम अनिवार्य है ।

व्यावसायिक जोखिमें भी प्राय, दो प्रकार की होती हैं । एक तो वे जिनका बीमा कराके स्वयं प्रबन्धक ही जोखिमों को हटा सकता है । उदाहरण के लिए, उद्योग में आग लग जाने वाली जोखिम, कच्चे माल या निर्मित माल की चोरी होने की जोखिम तथा श्रमिकों के मशीनों पर कार्य करते हुए दुर्घटनाग्रस्त होने वाली जोखिम, आदि ।

इन जोखिमों को बीमा कराके टाला जा सकता है । दूसरी जोखिम वे होती हैं जिनका बीमा नहीं कराया जा सकता । उदाहरण के लिए, बाजार में कीमतों के कम होने का भय या व्यापार चक्र, आदि की सम्भावना ।

(4) प्रयासों में मितव्ययिता (Economy in Efforts):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री का यह भी कर्त्तव्य है कि वह विकल्पों का मूल्यांकन करते समय इस बात को ध्यान में रखे कि कौन-सा विकल्प कम-से-कम प्रयासों के सर्वश्रेष्ठ परिणाम प्राप्त करा सकता है । किसी कार्य को करने में जितने कम साधन लगेगें उतनी ही लाभ-दर बढ़ेगी ।

(5) कार्य-निष्पादन में समय की बचत (Economy in Performance of Jobs):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री को चाहिए कि वह विकल्पों में मूल्यांकन करते समय इस बात को ध्यान में रखे कि कौन-से विकल्प से कम समय लगता है । प्रबन्धकों के समक्ष कई बार इस प्रकार की परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और उनको अति शीघ्र निर्णय कर लेना पड़ता है ।

अतः समय का तत्व बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है । कार्य-निष्पादन में समय की जितनी बचत होगी, कार्य-कुशलता उतनी ही अधिक बढ़ेगी ।

(6) कार्य-निष्पादन में समय की बचत (Achievement of Objects in Limited Means):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री को प्रबन्ध विज्ञान में सफलता तभी मिलेगी, जब कि वह कोई भी परामर्श देते समय इस तथ्य का ध्यान रखे कि साधन सीमित हैं । सीमित साधनों से ही लक्ष्य की प्राप्ति करनी है । अतः कार्य-निष्पादन का ऐसा तरीका होना चाहिए जिसमें साधन कम से कम लगें । सीमित साधनों की वजह से व्यावसायिक कार्य-कलापों में रुकावट नहीं आनी चाहिए ।

(7) सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन (Selection of Best Alternative):

नीति-निर्धारण के विभिन्न विकल्पों को निश्चित करने के बाद निर्णयन प्रक्रिया का अगला चरण उन विकल्पों में से किसी एक सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चुनाव करता है । व्यावसायिक अर्थशास्त्री का कर्त्तव्य है कि वह अपने अनुभव, प्रयोग, शोध एवं विश्लेषण, आदि के द्वारा सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चुनाव करे ।

व्यावसायिक अर्थशास्त्री को यह भी चाहिए कि वह विकल्प का चयन करते समय वास्तविकता को ध्यान में रखे । केवल काल्पनिक परिस्थितियों में लिए गये निर्णय सही नहीं होते, अतः सिद्धान्तों से अधिक व्यावहारिकता के पहलू पर ध्यान देना चाहिए ।

(8) निर्णय का क्रियान्वयन (Implementing the Decision):

जब किसी समस्या के समाधान के लिए कोई निर्णय ले लिया जाता है तो अगला चरण उसको कार्यरूप प्रदान करना है । व्यावसायिक अर्थशास्त्री को इस प्रकार के प्रयास करने चाहिए कि चुनी हुई कार्य-विधि सुचारू रूप से लागू की जा सके ।

क्रियान्वयन के अन्तर्गत कर्मचारियों को कार्य करने के लिए उत्प्रेरित करना, समन्वय स्थापित करना तथा नियन्त्रण, आदि से सम्बन्धित नीतियों का निर्धारण करना आदि आते हैं ।

अतः व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कर्त्तव्यों को निम्न दो भागों में रखा जा सकता है:

I. प्रबन्ध के प्रति कर्त्तव्य (Duties for Management):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री का कर्त्तव्य है कि वह प्रबन्धकों की महत्वपूर्ण निर्णय लेने में सहायता करे ।

अतः प्रबन्ध के उसके प्रमुख कर्तव्य निम्नलिखित हैं:

1. व्यूह-रचना सम्बन्धी निर्णयों में मदद (To Help in Taking Strategic Decisions),

2. प्रशासन सम्बन्धी निर्णयों में मदद (To Help in Administrative Decisions),

3. कार्य-संचालन सम्बन्धी निर्णयों में मदद (To Help in Operating Decisions),

4. भावी योजनाओं के निर्माण में मदद (To Help in Formulation of Forward Planning),

5. अनिश्चितताओं को कम करने में मदद (To Help in Minimising of Uncertainties),

6. विकास एवं सुधार में मदद (To Help in Growth and Improvement),

7. परिवर्तन का सामना करने के लिए योग्यता में सुधार लाने में मदद (To Help in Improving the Ability to Cope with Change),

8. प्रबन्ध में भविष्य के प्रति विचार करने की प्रकृति को जागृत करने में मदद (To Help in Increasing Forward Looking Attitude in Management),

9. कार्य-संचालन की कुशल पद्धतियों का विकास करने में मदद (To Help in Developing Efficient Methods),

10. उद्देश्यों को प्राप्त करने में मदद (To Help in Achieving of Objects), तथा

11. आर्थिक मामलों पर प्रबन्धकों के भाषण तैयार करने में सहायता करना ।

II. समाज एवं राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्य (Duties for Society and Nation):

एक व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कर्त्तव्य वर्तमान समय में समाज एवं राष्ट्र के प्रति बढ़ते जा रहे हैं । समाज के अन्तर्गत उपभोक्ता तथा कर्मचारी, आदि आ जाते हैं । ये दोनों मिलकर एक समाज का बहुत बड़ा भाग हैं ।

प्रमुख रूप से इन कर्त्तव्यों के अन्तर्गत निम्नलिखित का समावेश किया जाता है:

(1) कर्मचारियों के लाभ एवं कल्याणकारी योजनाओं को बनाने में मदद (To Help in Making of Schemes for Employee’s Benefit and Welfare)

(2) प्रेरणात्मक मजदूरी पद्धतियों को लागू कराने में मदद (To Help in Implementing of Incentive Wage Plans)

(3) उत्पादित माल की निरन्तर पूर्ति कराने में मदद (To Help in Continuous Supply of the Products)

(4) कालाबाजारी रोकने में मदद (To Help in Checking of Black Marketing)

(5) रोजगार के अवसर बढ़ाने वाली योजनाओं को प्रोत्साहित करने में मदद (To Help in Promoting Employment Providing Schemes)

(6) आर्थिक विकास में सरकार को मदद (To Help the Government in Economic Development),

(7) करों की चोरी रोकने में सरकार को मदद (To Help the Government in Checking of Tax-Evasion)

(8) आर्थिक साधनों का अधिकतम विदोहन करने में मदद (To Help in Maximum Utilization of Economic Resources)

(9) आर्थिक समस्याओं पर अपने विचार रखना व सुझाव देना (Giving Suggestions on Economic Problems) तथा

(10) मालिकों व कर्मचारियों में अच्छे सम्बन्ध विकसित करना (Developing Good Relation between Employer and Employees)


Essay # 4. व्यावसायिक अर्थशास्त्री के उत्तरदायित्व (Responsibilities of a Business Economist):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कार्यों एवं कर्त्तव्यों का अध्ययन करने के बाद उसके उत्तरदायित्वों की जानकारी होनी आवश्यक है । उत्तरदायित्वों के प्रति सचेत रहना व्यावसायिक अर्थशास्त्री के लिए परम आवश्यक है ।

उसे अपना उत्तरदायित्वों निभाने हेतु निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए:

(1) उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए साधनों को जुटाना (Acquiring of Resources for the Attainment of Objectives):

उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए साधनों को जुटा कर उन्हें निश्चित समय के अन्दर प्राप्त करने का प्रमुख उत्तरदायित्व है ।

(2) विनियोजित पूँजी पर उचित लाभ-दर को कायम रखना (To Maintain Reasonable Rate of Profit on Invested Capital):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री को सदैव यह देखना होगा कि व्यवसाय में लगी पूँजी पर लाभ-दर बढ़ती रहे । अतः उसका उत्तरदायित्व है कि वह प्रबन्धक को लाभ-दर में वृद्धि के लिए उपायों को बताता रहे । यदि लाभ-दर घटने की कोई भी आशंका है तो उससे बचने के लिए उपायों का सुझाव देना चाहिए ।

(3) आर्थिक सूचनाओं के स्रोतों का ज्ञान तथा विशेषज्ञों से सम्पर्क (Knowledge of Sources of Information and Contacts with Experts):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री को अपने कर्त्तव्यों को निभाने के लिए उन सभी स्रोतों को जानना होगा जिनके आधार पर आर्थिक घटनाओं की जानकारी हो सके तथा उन विशेषज्ञों से सम्पर्क स्थापित करना पड़ेगा जो उसको उद्देश्य पूर्ति के लिए उचित एवं सही सलाह दे सकें । हर व्यक्ति हर चीज का ज्ञाता नहीं हो सकता; अतः विभिन्न क्षेत्र के विशेषज्ञों से उसको सम्पर्क रखना पड़ेगा ।

(4) निर्णय-प्रक्रिया निर्धारित करना (To Develop the Decision-Making Process):

प्रबन्ध को दिन-प्रतिदिन निर्णय लेने पड़ते हैं अतः व्यावसायिक अर्थशास्त्री का यह उत्तरदायित्व है कि वह निर्णयों के लिए एक ऐसी प्रक्रिया निर्धारित करे जिससे प्रबन्ध स्वयं निर्णय ले सके ।

बहुत-सी ऐसी घटनाएँ होती है जिसमें शीघ्र निर्णय लेना पड़ता है तथा व्यावसायिक अर्थशास्त्री से सम्पर्क या राय लेने का समय नहीं मिल पाता है । ऐसी परिस्थितियों में यदि निर्णय प्रक्रिया से प्रबन्ध को अवगत करा दिया जाये तो कार्य बहुत अधिक आसान हो जाता है ।

(5) सफल पूर्वानुमान (Successful Forecast):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री का पूर्वानुमान के सम्बन्ध में उत्तरदायित्व बहुत अधिक है । किसी भी योजना या निर्णय की सफलता इस बात में निहित है कि पूर्वानुमान कितना सही होता है । अतः पूर्वानुमान लगाने में उसे उन सभी सांख्यिकी, गणितीय तथा आधुनिक तकनीकों को लगाना चाहिए जो भविष्य को स्पष्ट बना सकें ।

(6) त्रुटियों के प्रति प्रबन्ध को सचेत करना (Warning the Management for Errors in Prediction):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री का यह उत्तरदायित्व है कि वह प्रबन्ध को उन सब त्रुटियों के प्रति शीघ्र ही सचेत कर दे जो पूर्वानुमान लगाने में हो गयी हैं । ऐसा करके वह संस्था को हानि से बचा सकता है । अतः गलतियों को मानकर उसमें सुधार लाना हर व्यक्ति का उत्तरदायित्व है ।

(7) प्रतिपुष्टि तथा नियन्त्रण (Feedback and Control):

जब किसी निर्णय को कार्य-रूप दिया जाता है तो व्यावसायिक अर्थशास्त्री का यह उत्तरदायित्व हो जाता है कि वह उन निर्णयों के प्रभावों का मूल्यांकन करे तथा सूचनाओं तथा कड़ी के माध्यम से उन पर पूर्ण नियन्त्रण करके निर्णयन-प्रक्रिया को चालू रखे ।

(8) प्रभावपूर्ण समन्वय (Effective Co-Ordination):

एक व्यावसायिक अर्थशास्त्री का उत्तरदायित्व नीतियों के निर्धारण तथा उसको कार्यरूप देने में होता है । यह तभी सम्भव हो सकता है जबकि वह नीतियों के निर्माण तथा उनके क्रियान्वयन में ताल-मेल बैठा सके ।

इसके लिए उसे प्रभावपूर्ण समन्वय प्रणालियों को अपनाना पड़ेगा । समन्वय उच्चस्तरीय प्रबन्ध से लेकर निम्न स्तर तक स्थापित करना पड़ेगा तथा प्रबन्ध एवं कर्मचारियों के मध्य प्रभावपूर्ण संचार व्यवस्था स्थापित करनी होगी ।

अतः व्यावसायिक अर्थशास्त्री का वर्तमान युग में महत्वपूर्ण योगदान है । उसकी भूमिका आर्थिक एवं व्यावसायिक जगत में बढ़ती जा रही है । वह अपने दायित्वों को कितनी सफलता से निभा पाता है, इस बात पर उसका भविष्य निर्भर है ।

उसके कार्यक्षेत्र से आशा तो यही है कि व्यावसायिक कार्यों में उसका योगदान तब तक रहेगा जब तक कि अनिश्चितता का वातावरण समाप्त नहीं हो जाता । व्यापार में अनिश्चितता को कम तो किया जा सकता है लेकिन समाप्त नहीं किया जा सकता । अतः व्यावसायिक अर्थशास्त्री प्रबन्ध-तन्त्र का एक आवश्यक अंग है । वह अनिश्चितता के मध्य निर्णय लेने में मदद करता है ।


Essay # 5. व्यावसायिक अर्थशास्त्री की भूमिका एवं महत्व (Role and Importance of Business Economist):

आज के व्यवसाय जगत में व्यावसायिक अर्थशास्त्रियों का महत्व बढ़ता ही जा रहा है ।

प्रबन्ध की ऐसी बहुत-सी समस्याएँ है जिनका हल अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों के द्वारा किया जा सकता है । उदाहरण के लिए, उत्पादन की मात्रा या इकाई का अनुकूलतम आकार निर्धारित करने के लिए हमको उत्पादन के नियम (Laws of Return) की मदद लेनी पड़ती है ।

मूल्य-निर्धारण में माँग की लोच (Elasticity of Demand), माँग का नियम (Laws of Demand), उपभोक्ता की बचत (Consumer Surplus), सीमान्त उपयोगिता के सिद्धान्त (Theory of Marginal Utility), आदि का सहारा लेना पड़ता है ।

इसी प्रकार व्यवसाय की लाभ-देय क्षमता निर्धारित करने में जोखिम का सिद्धान्त (Risk Theory of Profit), अनिश्चितता वहन करने का सिद्धान्त (Uncertainty-Bearing Theory), सीमान्त उत्पादकता का सिद्धान्त (Modern Theory of Profit), आदि का विश्लेषण करना पड़ता है ।

अतः व्यावसायिक समस्याओं के हल के लिए अर्थशास्त्र का ज्ञान आवश्यक है । व्यवसाय जगत में व्यावसायिक अर्थशास्त्रियों की भूमिका इसीलिए बढ़ती जा रही है । एक कुशल एवं योग्य व्यावसायिक अर्थशास्त्री अनिश्चितताओं का पूर्वानुमान लगाकर जोखिमों को कम कर सकता है ।

व्यावसायिक अर्थशास्त्री का एक दायित्व यह भी है कि वह प्रबन्धकीय निर्णयों को प्रभावित करने वाले तत्वों को निश्चित करे और उसके लिए अपने सुझाव दे, इसीलिए उसका महत्व और भी अधिक हो गया है ।

निर्णयों को प्रभावित करने वाले घटकों को दो भागों में बाँटा जा सकता है:

a. आन्तरिक घटक (Internal Factors):

आन्तरिक घटक वे होते हैं जो प्रबन्धकों के नियन्त्रण में होते हैं या जो फर्म के कार्य-क्षेत्र के अन्तर्गत आते हैं । उदाहरण के लिए, कोई भी फर्म या संस्था इस बात के लिए स्वतन्त्र है कि वह कितनी पूँजी विनियोजित करे, कहाँ विनियोजित करे, कितने श्रमिकों को लगाये, उत्पादित वस्तुओं को किस प्रकार तथा कहाँ बेचे, वस्तु का मूल्य क्या निर्धारित करे, आदि ।

एक व्यावसायिक अर्थशास्त्री इन मामलों पर प्रबन्धकों को अपना मत देकर सही निर्णय लेने में सहायता प्रदान कर सकता है:

(i) उत्पादन का लक्ष्य

(ii) विक्रय का लक्ष्य

(iii) लाभ की मात्रा

(iv) विनियोजित नीति

(v) कोषों का उपयोग

(vi) नकद कोष सीमा

(vii) श्रमिकों की समस्याएँ

(viii) विपणन एवं विज्ञापन ।

b. बाह्य घटक (External Factors):

ये वे घटक होते हैं जिन पर प्रबन्ध का नियन्त्रण नहीं होता; यह उनके कार्य-क्षेत्र से बाहर होते हैं । व्यावसायिक दशाओं को निश्चित करने वाले घटक इस सीमा के अन्तर्गत आते हैं । यह तत्व सामान्य व्यावसायिक दशाओं का निर्माण करते हैं तथा यह प्रत्येक व्यावसायिक कार्य को प्रभावित करते हैं । अतः यह घटक प्रायः प्रत्येक व्यावसायिक इकाई पर लागू होते हैं ।

इसीलिए इनको वातावरण सम्बन्धी घटक (Environmental Factors) भी कहते हैं । एक व्यावसायिक अर्थशास्त्री को इन घटकों का अध्ययन तथा ध्यान हमेशा रखना चाहिए तथा इनका विश्लेषण कर उनके प्रभावों से सर्वोच्च प्रबन्ध (Top Management) को अवगत कराते रहना चाहिए । अतः नीतियों के निर्धारण में इन तत्वों का समावेश करना अति आवश्यक है ।

बाह्य घटकों में प्रमुख रूप से निम्न का ज्ञान होना आवश्यक है:

(i) विश्वव्यापी, क्षेत्रीय तथा स्थानीय आर्थिक प्रवृत्तियाँ क्या हैं?

(ii) राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का भविष्य कैसा है?

(iii) व्यापार चक्रों की गति क्या होगी?

(iv) नये बाजारों में उत्पादित वस्तुओं की माँग क्या होगी?

(v) सरकार की आर्थिक नीति क्या होगी?

(vi) नियन्त्रण तथा वित्तीय नीति क्या होने जा रही है?

(vii) प्रतियोगिता घटने या बढ़ने की क्या सम्भावनाएँ हैं?

(viii) पूँजी की लागत, ब्याज की दर तथा लाभ-दर बढेगी या घटेगी?

(ix) विदेशी व्यापार के सन्तुलन का क्या प्रभाव होगा?

(x) श्रमिक आन्दोलन का उत्पादन पर क्या प्रभाव होगा?

अतः एक व्यावसायिक अर्थशास्त्री प्रबन्ध को अपने महत्वपूर्ण सुझाव दे सकता है ।


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