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Economic Development of India | Hindi | Economics

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Read this article in Hindi to learn about the economic development of India.

हम दैनिक जीवन में व्यक्ति को किसी न किसी काम पर जाते देखते हैं । कुछ व्यक्ति खेतों में, करखानों में, विभिन्न नागरिक सेवाओं (शिक्षा, स्वास्थ, साफ-सफाई, यातायात, सुरक्षा आदि) स्वतंत्र व्यवसाय अथवा उद्योग व्यापार में कार्य करते हैं । उपरोक्त कार्यों से उन्हें आय प्राप्त होती है ।

इस आय से व्यक्ति अपनी आवश्यकता की वस्तुएं खरीदते हैं । इस प्रकार कुछ व्यक्ति उत्पादन से तथा कुछ व्यक्ति सेवाओं से आय अर्जित करते हैं । यदि देश के सभी व्यक्तियों की आय को जोड़ दिया जाए तो प्राप्त योगफल को राष्ट्रीय आय कहेगें तथा इसे देश की जनसंख्या से भाग दिया जाए तो प्राप्त भागफल देश की प्रति व्यक्ति आय कहलाएगा ।

इसी राष्ट्रीय आय अथवा प्रति व्यक्ति आय के आधार पर भारत, पाकिस्तान, चीन, नेपाल आदि देशों को विकासशील तथा अमेरिका, जापान, सिंगापुर, ब्रिटेन आदि विकसित देश कहलाते हैं । विकासशील देशों में व्यक्ति को न्यूनतम आवश्यकताएँ भोजन, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य एवं शिक्षा जैसी आधारभूत सुविधाओं की पूर्ति में अधिक ध्यान देना पड़ता है ।

सन् 1947 के पूर्व तक ब्रिटिश काल में भारत की अर्थव्यवस्था की काफी हानि हुई । भारत को कच्चे माल का स्रोत तथा तैयार माल का बाजार बना दिया गया था । ब्रिटिश शासकों द्वारा भारतीय उद्योगों को प्रोत्साहन नहीं दिया जाता था । उनका कच्चा माल सस्ते दरों पर खरीद लेते थे तथा अपना तैयार माल मंहगी दरों पर बेचते थे ।

इन कारणों से भारतीय निर्माता प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं, सके फलस्वरूप भारत में निर्धनता बढ़ गई । स्वतंत्र भारत को एक पिछड़ी अर्थव्यवस्था विरासत में मिली । भारत मूलत: कृषि प्रधान देश है । वर्तमान में भी लगभग 60 प्रतिशत से अधिक कार्यशील जनसंख्या कृषि के काम में लगी है । अत: कृषि विकास को जानना आवश्यक है ।

कृषि विकास:

कृषि भारत की अर्थव्यवस्था का आधार है तथा भारत के सकल घरेलु उत्पाद में 26 प्रतिशत का योगदान है । भारतीय कृषि खाद्यान्न उत्पादन के साथ-साथ उद्योगों के लिए कच्चा माल भी उपलब्ध कराती है । कृषि के अन्तर्गत खेती-बाड़ी, पशुपालन, वानिकी, मत्स्य पालन आदि भी शामिल हैं । कृषि की दृष्टि से भारत में विविधता है । भूमि के प्रकार व संरचना धूप एवं वर्षा फसलों के बोने एवं पकने के विभिन्न समय आदि बातें अलग-अलग क्षेत्रों में अलग- अलग हैं ।

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कृषि का महत्व:

हमारे देश की बड़ी जनसंख्या कृषि कार्य करती हैं । इससे उन्हें रोजगार, खाद्यान्न और आय प्राप्त होती है । उद्योगों को कच्चा माल कृषि से प्राप्त होता है । फसलों से किसानों की आय बढ़ने से उनका जीवन स्तर ऊंचा होता है । भारत के प्रत्येक क्षेत्र में कृषि की उत्पादकता भी समान नहीं रही है ।

मानसून पर कृषि की निर्भरता अभी भी बनी हुई है । प्राकृतिक विशेषताओं जैसे भूमि की प्रकृति जलवायु तथा सिंचाई की सुविधाओं के कारण भारतीय किसान विभिन्न प्रकार की कृषि करते हैं ।

इसके कुछ प्रमुख प्रकार हैं:

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1. आत्मनिर्वाह कृषि:

देश के बहुसंख्यक किसान छोटी और बिखरी जोतों व परम्परागत औजारों का प्रयोग करते हैं । कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण उन्नत बीजों, उर्वरकों एवं कीटनाशकों का प्रयोग नहीं कर पाते, अत: इससे उत्पादन भी कम होता है । इनका उत्पादन खाद्यान्न के रूप में उनके परिवार के उपभोग में प्रयुक्त हो जाता है ।

2. स्थानांतरी कृषि:

अत्यन्त पिछड़े क्षेत्रों में वनभूमि में वृक्षों को काटकर तनों और शाखाओं को जलाकर भूमि कृषि योग्य बनायी जाती थी । इस भूमि में कुछ मोटे अनाज जैसे शुष्क धान, मका, ज्वार आदि बोया जाता था । अब यह प्रथा हतोत्साहित कर दी गई है इससे वनों का विनाश होता था तथा उत्पादन भी अत्यन्त कम प्राप्त होता था ।

3. रोपण कृषि:

रोपण कृषि से तात्पर्य ऐसे पेड़-पौधों से है, जो कुछ वर्ष की अवधि के उपरान्त उत्पाद प्रदान करते हैं । इस तरह के उत्पादन में विशिष्ट वैज्ञानिक विधियों एवं स्थानीय सस्ते और कुशल खेतिहर मजदूरों के साथ-साथ विश्व स्तर पर पर्याप्त क्रय-विक्रय सुविधाओं की आवश्यकता होती है । अतएव रोपण कृषि एक कारखाने की इकाई के समान होती है, जैसे: चाय, रबर आदि ।

4. गहन कृषि:

सिंचाई की सुविधा, उर्वरकों एवं कीटनाशकों का प्रयोग करके एक ही भूमि पर लगातार कई बार एवं वर्षभर ऋतुओं के अनुसार कृषि कार्य करना गहन कृषि कहलाता है । इससे सीमित भूमि पर कृषि करके अधिक उपज और आय प्राप्त की जा सकती है ।

हमारे देश में विभिन्न प्रकार की फसलें-खाद्यान्न, दलहन और तिलहन, रेशेदार फसलें, पेय फसलें और नकदी फसलें उगाई जाती हैं । खाद्यान्नों के उत्पादन में हमारा देश अब आत्मनिर्भर हो गया है ।

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यह आत्मनिर्भरता रोपण एवं गहन कृषि, सिंचाई एवं कृषि के आधुनिक यंत्रों का उपयोग, उन्नत बीज, खाद एवं उर्वरक-कीटनाशकों के समुचित उपयोग से प्राप्त हुई हैं । आज हम चावल व गेहूँ के उत्पादन में चीन के बाद दूसरे प्रमुख स्थान पर हैं ।

खाद्यान्नों पर आत्मनिर्भरता के साथ-साथ कृषि उत्पादों का निर्यात करके विदेशी मुद्रा अर्जित कर राष्ट्रीय आय में वृद्धि की जा सकती हैं अत: कृषि का विकास आवश्यक है ।

औद्योगिक विकास:

वास्तव में विकसित देशों के पास खाद्यान्नों में आत्मनिर्भरता ही नहीं बल्कि निर्यात की योग्यता भी होनी चाहिए । इस योग्यता में विभिन्न सुदृढ़ औद्योगिक आधारभूत उद्योग (लोहा, सीमेंट, मशीनें आदि) एवं उत्पादों को संसाधित करना जैसे कपास से कपड़ा, गन्ने से चीनी, लकड़ी से कागज, बाक्साइड से एल्युमीनियम, लोहा से इस्पात बनाने की क्षमता होती है ।

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किसी देश की आर्थिक शक्ति उसके निर्माण उद्योगों के विकास से मापी जाती है । इन उद्योगों से व्यक्तियों को रोजगार मिलता है, कृषि पर निर्भरता कम होती है, निर्मित वस्तुओं के निर्यात से विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है । औद्योगिक विकास देश व नागरिकों के लिए समृद्धि लाता है । उद्योगों को छोटे व बडे पैमाने के उद्योग, निजी व सार्वजनिक, संयुक्त व सहकारी वर्गो में बाँटा जाता है ।

कच्चे माल के उपयोग के आधार पर भी उद्योगों को दो वर्गों में बांटा जाता है ।

उनका परिचय इस प्रकार है:

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1. कृषि आधारित उद्योग:

सूती, जूट, रेशमी और ऊनी वस्त्र उद्योग, चीनी व खाद्य तेल कृषि से प्राप्त कच्चे माल पर आधारित उद्योग हैं । सूती और रेशमी वस्त्र बनाने में भारत का एकाधिकार प्राचीन काल से चला आ रहा है । भारत सूती वस्त्रों का निर्यात अधिकतर सिले-सिलाये वस्त्रों के रूप में करता है ।

यह निर्यात संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, फ्रांस, यूरोप के पूर्वी देश, नेपाल, सिंगापुर, श्रीलंका व अफ्रीका के देशों को किया जाता है । सूती वस्त्र मिलें महाराष्ट्र, गुजरात, पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश व तमिलनाडु में स्थापित हैं । जूट एवं जूट से बने सामान भारत का दूसरा बड़ा उद्योग हैं ।

ऊनी वस्त्रों का उत्पादन पंजाब, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, गुजरात, हरियाणा और राजस्थान में किया जाता है । ऊनी वस्त्र भारत से अनेक देशों में भी निर्यात किये जाते हैं । चीनी उद्योग के रूप में भारत का स्थान संसार में दूसरा है । उत्तरप्रदेश व महाराष्ट्र में सबसे अधिक चीनी मिलें हैं । आन्ध्रप्रदेश व गुजरात में भी चीनी मिलें स्थापित की गई हैं ।

2. खनिजों पर आधारित उद्योग:

ऐसे उद्योग जो कच्चे माल के लिए खनिजों पर निर्भर हैं, जैसे लोहा और इस्पात सीमेंट तथा रसायन उद्योग खनिज आधारित उद्योग हैं । भारत में लोहा व इस्पात का पहला कारखाना सन् 1830 में पोर्टोनोवा नामक स्थान में तमिलनाडु में लगाया गया ।

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लोहा व इस्पात बनाने का आधुनिक कारखाना 1907 में जमशेदपुर (झारखण्ड) में लगाया गया । लोहा व इस्पात एक भारी उद्योग है क्योंकि इसमें अधिक स्थान घेरने वाले कच्चे माल का उपयोग होता है । इसमें लोह अयस्क, कोकिंग कोयला, चूना पत्थर और मैंगनीज अयस्क का उपयोग किया जाता है ।

इसका उत्पादित माल भी भारी होता है । एल्युमीनियम एवं तांबा का प्रगलन भी भारत के बडे उद्योग हैं । इसके अतिरिक्त रसायनिक उद्योग जिनके अंतर्गत उर्वरक, कृत्रिम रेशे, कृत्रिम रबड़, प्लास्टिक की वस्तुएं, रंग-रोगन तथा औषधियाँ तैयार की जाती हैं ।

परिवहन उपकरण जैसे: रेल के इंजन, डिब्बे, मोटर वाहन (बस, ट्रक, कार, मोटर, साइकिल आदि) वायुयान एवं पोत बनाने सम्बन्धी बडे एवं भारी उद्योग तथा इलेक्ट्रानिक उद्योग स्थपित किये गए हैं । उपरोक्त सभी प्रकार के उद्योग बड़ी मात्रा में व्यक्तियों को रोजगार उपलब्ध कराते है । ये सभी प्रयास हमारे देश के औद्योगिक विकास के सूचक हैं ।

3. सेवा क्षेत्र:

इस क्षेत्र में सूचना प्रौद्योगिकी, बैंक, बीमा, वित्तीय संस्थान आदि क्षेत्र आते हैं । साफ्टवेयर विकास के क्षेत्र में भारत दुनिया में प्रसिद्ध है ।

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4. कुटीर व लघु उद्योग:

हमारे देश में उत्पादन और राष्ट्रीय आय की वृद्धि में कुटीर उद्योगों का बहुत महत्व है । कुटीर उद्योग परम्परागत उद्योग हैं, इनमें कम पूंजी लगती है तथा घर के सदस्यों द्वारा ही वस्तुएं बना ली जाती है । किसान के पास 6 माह काम रहता है ।

शेष 6 माह में जब वे बेरोजगार रहते हैं, तब इन कार्यो को कर धन कमाते है । खिलौने बनाना, लिफाफे, पापड़, बड़ी बनाना, चटाई, झाडू, मसाले, बीड़ी, कपड़े बुनना आदि कार्य कुटीर उद्योगों में किए जाते है । इसी तरह लघु उद्योग में भी कम पूंजी लगती है ।

कम मजदूरों द्वारा ही कार्य करा लिया जाता है । सरकार अब इन उद्योगों हेतु ऋण उपलब्ध करा रही है और इससे उत्पादन बढ़ाने में मदद मिल रही है तथा बेरोजगारों को रोजगार प्राप्त हो रहा है ।

आर्थिक विकास एवं पंचवर्षीय योजनाएं:

नियोजन का अर्थ है साधनों, प्राथमिकताओं का निर्धारण करना तथा निर्धारित लक्ष्यों और उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए आगे कदम बढ़ाना । यह बात हमारी इस धारणा पर आधारित है कि आगे कदम बढ़ाने के पूर्व विचार करो और सोचो । इन्हें कार्यान्वित करने के फलस्वरूप कृषि व उद्योगों के उत्पादन में वृद्धि हुई हैं । वर्तमान में 11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-2012) चल रही है ।

इस योजना में तीन बातें रखी गईं हैं:

1. विकास के लक्ष्य निर्धारित करना तथा उनकी प्राथमिकता निश्चित करना ।

2. उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना ।

3. नियोजित विकास के फलस्वरूप उत्पादित वस्तुओं और उनसे अर्जित लाभ का न्यायोचित वितरण करना ।

नियोजन के माध्यम से विकास को गति देना पंचवर्षीय योजनाओं का मुख्य उद्देश्य है ।

मुख्य आर्थिक समस्याएं:

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प्राचीन काल में भारतीय अर्थव्यवस्था समृद्ध एवं विकसित थी । भारत में आर्थिक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता थी । सिन्धु घाटी सभ्यता के समय मिट्‌टी के बर्तन, धातु उद्योग, भवन निर्माण उन्नत अवस्था में था । मध्यकाल में भारतीय रेशम की मांग विदेशों में इतनी अधिक थी कि रोम के निवासी रेशमी वस्त्रों के भार के बराबर सोना देने को तत्पर रहते थे ।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी प्रारम्भिक वर्षो में बहुमूल्य धातुओं के बदले भारत में बने कपड़े, मसाले व कुटीर उत्पाद खरीदती थी । बाद में स्थितियों में परिवर्तन हो गया । स्वतंत्रता प्राप्ति के छ: दशकों में हमने विकास के बहुत से कार्य किये हैं एवं उनका लाभ भी लिया है किन्तु आज भी हमारे समक्ष कुछ आर्थिक समस्याएं विद्यमान है । जिनमें प्रमुख रूप से जनसंख्या वृद्धि, निर्धनता, बेरोजगारी, एवं मूल्यवृद्धि का सामना हमें करना पड़ रहा है ।

इनकी जानकारी इस प्रकार है:

1. जनसंख्या वृद्धि:

भारत के आर्थिक विकास में तेजी से बढ़ती जनसंख्या एक बड़ी समस्या है । स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद केवल इसी समस्या के कारण गरीबी बेरोजगारी जैसी समस्याएं आज तक सुलझ नहीं सकीं । वर्ष 1951 में हमारे देश की कुल जनसंख्या 36 करोड़ थी, वहीं 2001 की जनगणना के अनुसार देश की जनसंख्या 102 करोड़ तक पहुंच गई ।

जनसंख्या वृद्धि का मूल कारण निर्धनता, अशिक्षा, वंश चलाने के लिए लड़के की लालसा व कम आयु में विवाह होना है । जनसंख्या की वृद्धि के परिणामस्वरूप देश की आर्थिक प्रगति में बाधा आती है । इसका प्रभाव देश के लोगों के जीवन स्तर पर पड़ता है क्योंकि जिस अनुपात में जनसंख्या में वृद्धि होती है उसी अनुपात में खाद्यान्नों तथा उद्योग धंधों का विस्तार संभव नहीं है । हमारे देश की अधिकांश जनसंख्या कृषि पर आश्रित है । इतनी तेजी से बढ़ती जनसंख्या का पोषण करने में हमारी खेती समर्थ नहीं है । जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ कृषि योग्य या उपजाऊ भूमि व वन क्षेत्र की भूमि कम होती जा रही है ।

क्योंकि:

i. बढ़ती जनसंख्या के कारण सड़कें, विविध आवासीय कॉलोनियाँ, जनहित हेतु अस्पताल, पोस्ट ऑफिस अथवा अन्य विभागों हेतु भवनों का निर्माण ।

ii. सुविधाओं हेतु एयरपोर्ट, बस अड्डे अथवा अन्य संचार कार्यों हेतु भूमि का आवंटन । मिट्‌टी का एक बहुत बड़ा भाग अन्य कार्यों में प्रयोग हो रहा है, जैसे: मकानों के लिए ईंट बनाना आदि ।

iii. मवेशी तथा अन्य जानवरों को चराने हेतु भूमि क्षेत्र में चारागाहों का विकास ।

iv. पेड़-पौधों की लगातार कटाई से प्रतिवर्ष लाखों हेक्टेयर भूमि की ऊपरी सतह नदी तथा वर्षा के जल अथवा बाढ़ से बह जाती है ।

2. निर्धनता:

निर्धनता एक ऐसी दशा है, जिसमें किसी व्यक्ति को अपने जीवन-यापन के लिए भोजन, वस्त्र और मकान जैसी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति करने में कठिनाई होती है । निर्धनता का दुष्परिणाम व्यक्तिगत एवं परिवार के स्वास्थ्य पर भी होता है ।

जिससे व्यक्ति की उत्पादन क्षमता घट जाती है अत: निर्धनता निरंतर बनी रहती है । संभव है आपके पास-पड़ोस में कुछ ऐसे लोग हों जिन्हे दिन में दो बार भरपेट भोजन न मिलता हो बच्चे कुपोषण के शिकार हों पहनने के लिए मौसम के अनुरूप पर्याप्त वस्त्र न हों विद्यालय में आने की आयु होने पर भी विद्यालय न आकर कहीं आय उपार्जन कार्यों में जाते हों ।

इन्हें अर्थशास्त्र में गरीबी से पीड़ित और गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोग कहा जाता है । ऐसे लोगों की दशा सुधारने तथा गरीबी रेखा से ऊपर लाने का कार्य सरकार और समाज का है । सरकार इसके लिए दो कार्य करती है, पहला-गरीबी रेखा में रहने वाले व्यक्तियों व परिवारों को चिह्नित कर कार्ड बनाना तथा दूसरा उन्हें गरीबी रेखा से ऊपर लाने हेतु सहायता एवं रोजगार उपलब्ध कराना ।

3. बेरोजगारी:

सभी व्यक्ति अपनी दैनिक और भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में जीविकोपार्जन के लिए कार्य करते हैं । जब किसी व्यक्ति को लाभप्रद काम या नौकरी नहीं मिलती तो उसे बेरोजगार कहा जाता है । बेरोजगारी वह स्थिति है जिसमें कोई व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से कार्य करने के इच्छुक होने पर भी कार्य पाने में असमर्थ रहता है ।

हमारे देश में बेरोजगारी का प्रथम कारण है अर्थव्यवस्था का मंद विकास । बेरोजगारी का दूसरा कारण है जनसंख्या में अत्यधिक वृद्धि । इसके परिणामस्वरूप 15 से 59 आयु वर्ग के सर्वाधिक व्यक्ति रोजगार की प्रतीक्षा में हैं । विगत दशकों में जनसंख्या जिस गति से बड़ी है उस गति से रोजगार के अवसर नहीं बढे ।

हमारे देश में शिक्षित बेरोजगार भी बढे हैं इसका कारण उनकी सोच में ही है । वे अपना पारिवारिक एवं परंपरागत व्यवसाय नहीं करना चाहते । वास्तव में सरकारी अथवा गैर सरकारी क्षेत्र में इतने अवसर नहीं है कि सभी को सफेदपोश रोजगार दिया जा सके । शिक्षित बेरोजगारों को अपने परम्परागत रोजगारों पर भी ध्यान केन्द्रित करना चाहिए ।

4. मूल्यवृद्धि:

जब हम कक्षा 5 में पढ़ते थे तब एक पेसिंल, पेन अथवा कापी का मूल्य कितने रूपये था तथा अब यह मूल्य कितना बढ गया है । मूल्य क्यों बढ़ते हैं ? मूल्य बढ़ना अच्छा है अथवा नहीं । सरकार द्वारा समय-समय पर मूल्यवृद्धि का मापन किया जाता है तथा मूल्यवृद्धि को स्थिर रखने के उपाय किये जाते हैं ।

मूल्यों में परिवर्तन जानने के लिए थोक मूल्य तथा उपभोक्ता मूल्य सूचकांकों बनाये जाते हैं । इन सूचकांकों में सभी उत्पादित वस्तुओं के मूल्य को शामिल किया जाता है । विशेषकर उपभोक्ता वस्तुओं में भोजन सामग्री कपड़े तथा अन्य आवश्यक पदार्थों के मूल्यों को नियंत्रण में रखने का प्रयास किया जाता है ताकि व्यक्तियों का जीवन स्तर सामान्य बना रह सके ।

निरंतर और अनियंत्रित मूल्यवृद्धि सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को संकट में डालती है, निर्धन और अधिक निर्धन हो जाते हैं । कभी-कभी व्यापारी जिनका मुख्य उद्देश्य अधिक लाभ कमाना है अनैतिक एवं गैरकानूनी तरीके से मूल्य बढ़ा देते हैं ।

यदि ये वस्तुएं खाद्यान्नों की श्रेणी की हों तब निर्धन वर्गों के लिए यह बड़ी समस्या हो जाती है । मूल्यवृद्धि, आर्थिक असमानता एवं निर्धनता को बढ़ाती है । सरकार और नागरिकों के प्रयास एवं सजगता से मूल्यवृद्धि पर नियंत्रण किया जा सकता है ।

5. भ्रष्टाचार:

किसी कार्य को अपने हित में कराने के लिए पैसा या वस्तु किसी अन्य व्यक्ति या संस्था को देना भ्रष्टाचार या घूसखोरी कहलाता है । करों की चोरी भी इसी श्रेणी में मानी जाती है । आए दिन आप समाचार-पत्रों में भ्रष्टाचार की खबरें पढ़ते हैं ।

इसमें पैसे या वस्तु देने वाला और लेने वाला दोनों ही अपराधी हैं । भ्रष्टाचार से आर्थिक असमानता बढ़ती है और गरीब अधिक गरीब हो जाते हैं । यह उन्नति की जड़ों को कुतरकर खोखला कर देता है । सरकार ने अनेक नियम और कानून बनाकर भ्रष्टाचार रोकने के प्रयास किए हैं । अत्यधिक खर्चीले चुनाव भी भ्रष्टाचार का प्रमुख कारण हैं ।

उपरोक्त समस्याओं के अतिरिक्त जनसंख्या वृद्धि का दबाव नगरों में खाली पड़ी भूमि पर बढ़ने लगता है । कई बार ऐतिहासिक इमारतों का प्रयोग सरकारी कार्यालयों, सार्वजनिक पुस्तकालयों आदि के रूप में होने लगता है । कहीं-कहीं ये अपशिष्ट फेंकने के लिए प्रयुक्त होने लगते हैं । बच्चे इनमें खेलने लगते हैं । कभी-कभी इन्हें गिरवाकर नव-निर्माण कर दिया जाता है ।

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