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Equilibrium of a Firm in Perfect Competition | Hindi | Markets | Economics

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Read this article in Hindi to learn about the short-term and long-term equilibrium of a firm in perfect competition.

A. अल्पकाल में पूर्ण प्रतियोगी फर्म का सन्तुलन (Short-Term Equilibrium of Perfectly Competitive Firm):

हम यह अध्ययन कर चुके हैं कि अल्पकाल वह समयावधि है जिसमें उत्पत्ति के समस्त साधनों को परिवर्तित नहीं किया जा सकता । अल्पकाल में उत्पत्ति के कुछ साधन स्थिर एवं अपरिवर्तनीय रहते हैं ।

अल्पकाल की इस समयावधि में केवल परिवर्तनशील साधन (जैसे – श्रम, कच्चा माल आदि) में परिवर्तन करके ही उत्पादन स्तर में कमी या वृद्धि की जा सकती है । अल्पकाल इतनी सूक्ष्म समयावधि है कि उद्योग में न तो अतिरिक्त फर्में प्रवेश कर सकती हैं और न ही उद्योग में कार्य कर रही फर्में उद्योग को छोड़ सकती हैं ।

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सन्तुलन की शर्तों के आधार पर एक पूर्ण प्रतियोगी फर्म अल्पकाल में निम्नलिखित दशाओं में रह सकती है:

(i) लाभ की दशा (Profit Situation)

(ii) सामान्य लाभ की दशा (Normal Profit Situation)

(iii) हानि की दशा (Loss Situation)

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(i) फर्म का अल्पकालीन सन्तुलन : लाभ की दशा (Short-Term Equilibrium of Firm : Profit Situation):

चित्र 14 में पूर्ण प्रतियोगी फर्म के अल्पकालीन लाभ की दशा स्पष्ट की गयी है ।

SAC तथा SMC क्रमशः अल्पकालीन औसत लागत वक्र तथा अल्पकालीन सीमान्त आगम वक्र को प्रदर्शित करते हैं । पूर्ण प्रतियोगिता की दशाओं के अनुसार सीमान्त आगम (MR) तथा औसत आगम (AR) बराबर होते हैं जिसे चित्र में X-अक्ष के समानान्तर पड़ी रेखा के रूप में दिखाया गया है ।

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सन्तुलन की शर्तों के अनुसार बिन्दु E पर फर्म सन्तुलन प्राप्त करेगी क्योंकि इस बिन्दु पर MR और MC बराबर हैं तथा SMC वक्र MR वक्र को नीचे से काट रहा है ।

सन्तुलन बिन्दु E पर,

उत्पादन मात्रा = OQ

प्रति इकाई कीमत = OP अथवा EQ

औसत लागत = OR अथवा TQ

प्रति इकाई लाभ = EQ – TQ = ET (अथवा PR)

फर्म का कुल लाभ = प्रति इकाई लाभ × उत्पादन = PRET क्षेत्रफल

(ii) फर्म का अल्पकालीन सन्तुलन: सामान्य लाभ की दशा (Short-Term Equilibrium of Firm: Normal Profit Situation):

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यदि बाजार में कीमत (माँग एवं पूर्ति दशाओं द्वारा निर्धारित उद्योग की कीमत) फर्म की लागत दशाओं की तुलना में केवल इतनी ही है कि फर्म की औसत लागत (AC) तथा वस्तु की कीमत (AR) बराबर हों तो ऐसी स्थिति फर्म के लिए सामान्य लाभ (Normal Profit) अथवा शून्य लाभ (Zero Profit) की होगी । इस स्थिति को चित्र 15 में दिखाया गया है ।

उद्योग द्वारा निर्धारित कीमत OP है । औसत लागत वक्र तथा सीमान्त लागत वक्र क्रमशः SAC तथा SMC द्वारा दिखाये गये हैं । सन्तुलन की शर्तों के अनुसार फर्म का सन्तुलन बिन्दु E पर होगा ।

सन्तुलन बिन्दु E पर,

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उत्पादन मात्रा = OQ

वस्तु की कीमत = OP अथवा EQ

प्रति इकाई औसत लागत = OP अथवा EQ

अर्थात्, औसत लागत = औसत आगम

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AC = AR

बिन्दु E पर, AR = MR = SMC = SAC

(iii) अल्पकालीन फर्म सन्तुलन : हानि की दशा (Short-Term Equilibrium of Firm : Loss Situation):

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कुछ परिस्थितियाँ ऐसी भी हो सकती हैं कि प्रचलित बाजार कीमत फर्म की लागत से भी कम हो अर्थात् AR वक्र रेखा औसत तथा सीमान्त लागत वक्रों से भी नीचे स्थित हो । ऐसी स्थिति में फर्म को हानि होगी । चित्र 16 में अल्पकालीन हानि की स्थिति को दिखाया गया है । सन्तुलन की शर्तों के अनुसार फर्म का सन्तुलन बिन्दु E पर होगा जहाँ MR= MC ।

सन्तुलन बिन्दु E पर,

उत्पादन मात्रा = OQ

प्रति इकाई वस्तु की कीमत = OP अथवा EQ

प्रति इकाई औसत लागत = OR अथवा TQ

प्रति इकाई हानि = PR अथवा TE

कुल हानि = RTEP क्षेत्र

RTEP क्षेत्र फर्म की कुल हानि को प्रदर्शित करता है । हानि के कारण समान लागतों के अन्तर्गत कार्य कर रही सभी फर्में हानि उठायेंगी । अनेक फर्में उद्योग से अलग होना चाहेंगी कि अल्पकाल फर्मों को उद्योग से अलग होने की अनुमति नहीं देगा ।

यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य यह है कि फर्म E बिन्दु पर सन्तुलन में होने के कारण न्यूनतम हानि (Minimum Loss) ही उठा रही है । बिन्दु E पर उत्पादन OQ है । यदि फर्म उत्पादन मात्रा OQ में परिवर्तन का प्रयास करती है तो निश्चित रूप से यह अपेक्षाकृत अधिक हानि उठायेगी ।

अल्पकालीन हानि : उत्पादन बन्द होने का बिन्दु (Short-Term Loss : Shut Down Point) :

अब प्रश्न यह उठता है कि हानि की स्थिति में फर्म क्यों उत्पादन जारी रखेगी ? फर्म क्यों नहीं उत्पादन बन्द कर देती ? वास्तविकता यह है कि फर्म अल्पकाल में एक विशेष बिन्दु तक उत्पादन में सलग्न रहती है किन्तु उस बिन्दु विशेष के बाद भी यदि कीमत कम होती है तो फर्म उत्पादन को अल्पकाल में भी बन्द कर देगी ।

अल्पकाल में एक फर्म हानि की स्थिति में उद्योग से अलग नहीं हो सकती । अल्पकाल में उत्पत्ति के समस्त साधन परिवर्तनशील नहीं होते । अल्पकाल इतनी लम्बी समयावधि नहीं होती कि फर्म उत्पत्ति के समस्त साधनों को अपनी आवश्यकता तथा इच्छानुसार परिवर्तित कर सके ।

फर्म अल्पकाल में स्थिर उत्पत्ति साधनों, जैसे – भूमि, पूँजी, उपकरण तथा मशीनें आदि को नहीं बदल सकती । फर्म की उत्पादन लागत के अन्तर्गत अल्पकाल में परिवर्तनशील लागत (Variable Cost) तथा स्थिर लागत (Fixed Cost) दोनों सम्मिलित होती हैं ।

इस प्रकार अल्पकाल में,

औसत लागत = औसत स्थिर लागत + औसत परिवर्तनशील लागत

या, AC = AFC + AVC

अल्पकाल में फर्म यदि हानि की स्थिति में उत्पादन बन्द भी कर देती है तब भी उसे स्थिर लागत वहन करनी पड़ेगी । इसलिए यदि फर्म अल्पकाल में वस्तु की इतनी कीमत प्राप्त कर रही है कि उसकी परिवर्तनशील लागतें उसे प्राप्त हो रही हों अर्थात् यदि अल्पकाल में वस्तु की कीमत औसत परिवर्तनशील लागत (AVC) से अधिक है, तब फर्म हानि की स्थिति में भी उत्पादन जारी रखेगी ।

वस्तु की कीमत AVC से जितनी अधिक होगी वह औसत स्थिर लागत (AFC) को सूचित करेगी । यदि वस्तु की कीमत AVC से ऊपर AFC का आंशिक भाग भी पूरा करती है तब फर्म के लिए यह हितकर होगा कि वह हानि की स्थिति में भी उत्पादन जारी रखे ।

यदि अल्पकाल में फर्म उत्पादन बन्द कर देती है तो फर्म को स्थिर लागत के बराबर हानि उठानी पड़ेगी । जब तक फर्म अल्पकाल में वस्तु की कीमत औसत परिवर्तनशील लागत (AVC) के बराबर अथवा उससे अधिक प्राप्त करती रहेगी तब तक फर्म हानि की स्थिति में भी उत्पादन जारी रखेगी ।

किन्तु जब वस्तु की कीमत इतनी कम हो जाती है कि फर्म को उसकी परिवर्तनशील लागतें भी प्राप्त नहीं होतीं तब ऐसी स्थिति में फर्म के लिए यही हितकर होगा कि वह अल्पकाल में अपना उत्पादन तुरन्त बन्द कर दे । ऐसा करने से फर्म परिवर्तनशील लागतों द्वारा उत्पन्न हानि से अपने को बचा पायेगी ।

जिस बिन्दु पर वस्तु की कीमत परिवर्तनशील लागत के बराबर या उससे थोड़ा भी कम हो जाती है वहीं उत्पादन बन्द बिन्दु (Shut Down Point) प्राप्त होता है । कहने का अभिप्राय यह है कि फर्म अल्पकाल में वस्तु की कीमत औसत परिवर्तनशील लागत (AVC) से कम होते ही उत्पादन बन्द कर देगी ।

अल्पकाल में उत्पादन बन्द होने की दशा की व्याख्या चित्र 17 में की गई है । चित्र में अल्पकालीन औसत लागत वक्र (SAC Curve) तथा अल्पकालीन सीमान्त लागत वक्र (SMC Curve) दिखाये गये हैं । चित्र में औसत परिवर्तनशील लागत वक्र (AVC Curve) भी प्रदर्शित किया गया है ।

चित्र में SAC तथा AVC वक्रों के मध्य खड़ी दूरी (Vertical Distance) औसत स्थिर लागत (AFC) को सूचित करती है । दोनों वक्रों के मध्य खड़ी दूरी उत्पादन के बढ़ने के साथ-साथ कम होती जा रही है क्योंकि उत्पादन के बढ़ने पर औसत स्थिर लागत गिरती जाती है । जब बाजार में वस्तु की कीमत OP1 है तब फर्म का सन्तुलन बिन्दु E होगा तथा फर्म OQ1 वस्तु का उत्पादन कर रही होगी ।

सन्तुलन बिन्दु E पर,

वस्तु की कीमत = OP1 या EQ1

औसत लागत = KQ1

औसत परिवर्तनशील लागत = CQ1

औसत स्थिर लागत = KC

प्रति इकाई हानि = KE

कुल हानि = RKEP1 क्षेत्र

फर्म बिन्दु E पर उत्पादन को जारी रखेगी क्योंकि फर्म को प्राप्त वस्तु की कीमत OP1 स्थिर लागत का EC भाग पूरा कर रही है । यदि फर्म कुल हानि RKEP1 क्षेत्र के कारण अल्पकाल में उत्पादन बन्द कर देती है तो वह प्रति इकाई KC हानि उठायेगी जबकि उत्पादन करते हुए वह केवल KE हानि उठा रही है जो KC से कम है । इस प्रकार फर्म की हानि उत्पादन जारी रखने पर उत्पादन बन्द कर देने की तुलना में कम होगी ।

यदि वस्तु की कीमत घटकर OP2 हो जाती है तब फर्म का सन्तुलन बिन्दु T पर होगा जहाँ फर्म OQ उत्पादन कर रही है ।

बिन्दु T पर,

वस्तु की कीमत = OP2 अथवा TQ

औसत परिवर्तनशील लागत = TQ

अर्थात्, वस्तु की कीमत = औसत परिवर्तनशील लागत

इस प्रकार, बिन्दु T पर फर्म स्थिर लागत का कोई भी भाग प्राप्त नहीं कर रही है । इस बिन्दु पर फर्म तटस्थ (Indifferent) रहेगी क्योंकि फर्म बिन्दु T पर यदि उत्पादन बन्द कर देती है तो उसे कुल स्थिर लागतों के बराबर हानि हो रही है ।

वस्तु की कीमत OP2 पर फर्म उत्पादन जारी भी रख सकती है और बन्द भी कर सकती है क्योंकि दोनों स्थितियों में फर्म को एक समान हानि हो रही है किन्तु यदि वस्तु की कीमत और घटकर OP3 हो जाये तो फर्म तुरन्त उत्पादन बन्द कर देगी क्योंकि इस वस्तु की कीमत पर फर्म अपनी परिवर्तनशील लागतों को भी पूरा नहीं कर रही है ।

इस बिन्दु T को उत्पादन बन्द होने का बिन्दु (Shut Down Point) कहा जाता है अर्थात् इस बिन्दु से जैसे ही वस्तु की कीमत कम हो जाती है वैसे ही फर्म वस्तु का उत्पादन बन्द कर देती है ।

(B) दीर्घकाल में पूर्ण प्रतियोगी फर्म का सन्तुलन (Equilibrium of Perfectly Competitive Firm in Long-Term):

दीर्घकाल वह समयावधि है जिसमें उत्पत्ति के सभी साधन, उत्पादन तकनीक, प्लाण्ट का आकार आदि पूर्णतः आवश्यकतानुसार परिवर्तित किये जा सकते हैं । पूर्ण प्रतियोगिता में एक फर्म दीर्घकाल में उत्पादन को माँग के अनुसार पूर्णरूपेण समायोजित कर सकती है । दीर्घकाल इतनी लम्बी समयावधि है कि कोई भी फर्म उद्योग में प्रवेश कर सकती है अथवा उद्योग को छोड़कर अलग हो सकती है ।

अतः दीर्घकाल में उद्योग में काम कर रही प्रत्येक फर्म को सामान्य लाभ (Normal Profit) ही प्राप्त होता है । दीर्घकाल में यदि फर्में लाभ अर्जित कर रही हैं तो अन्य फर्में लाभ से आकर्षित होकर उस उद्योग में सम्मिलित होंगी जिसके कारण उद्योग की पूर्ति में वृद्धि होगी ।

पूर्ति अधिक होने पर कीमत घटेगी फलतः फर्मों का लाभ सामान्य लाभ में बदल जायेगा । इसके विपरीत यदि फर्मों को हानि हो रही है तो अनेक फर्में उद्योग छोड़ देंगी जिसके कारण पूर्ति में कमी होगी जिसके फलस्वरूप वस्तु की कीमत बढ़ेगी, फलतः फर्मों को हो रही हानि सामान्य लाभ में बदल जायेगी ।

दीर्घकाल में सन्तुलन की दोहरी शर्तें पूरी होनी चाहिए:

(i) MR = MC

(ii) AR = AC

अर्थात्, AR = MR = AC = MC

पूर्ण प्रतियोगी फर्म का दीर्घकालीन सन्तुलन चित्र 18 में दिखाया गया है । चित्र में दीर्घकालीन सन्तुलन की शर्तें बिन्दु E पर पूरी हो रही हैं ।

अर्थात्, MR = AR = AC = MC

बिन्दु E पर,

प्रति इकाई कीमत = OP अथवा EQ

कुल उत्पादन = OQ

औसत लागत = EQ

औसत लागत (AC) = औसत आगम (AR)

अर्थात् फर्म केवल सामान्य लाभ प्राप्त कर रही है ।

यहाँ बात ध्यान देने योग्य है कि दीर्घकाल में वस्तु की कीमत OP से कम या अधिक नहीं हो सकती क्योंकि इस कीमत पर फर्म को सामान्य लाभ प्राप्त हो रहा है । यदि वस्तु की कीमत OP से अधिक होगी तो फर्म को अधिक लाभ प्राप्त होगा जिसके कारण अन्य फर्में उद्योग में आकर लाभ को सामान्य लाभ में बदल देंगी ।

इसके विपरीत, यदि वस्तु की कीमत OP से कम है तो फर्म को हानि होगी जिसके कारण कुछ फर्में उद्योग को छोड़ देंगी, फलतः हानि पुनः सामान्य लाभ में बदल जायेगी ।

इस प्रकार, संक्षेप में कहा जा सकता है कि दीर्घकाल में पूर्ण प्रतियोगी फर्म सदैव सामान्य लाभ ही प्राप्त करेगी । दूसरे शब्दों में, दीर्घकालीन सन्तुलन औसत लागत वक्र (AC Curve) के न्यूनतम बिन्दु पर होगा अर्थात् दीर्धकाल में फर्म अनुकूलतम प्लाण्ट के आकार (Optimum Plant Size) पर कार्य करेगी ।

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