Here is an essay on ‘Production’ for class 9, 10, 11 and 12. Find paragraphs, long and short essays on ‘Production’ especially written for school and college students in Hindi language.

Essay # 1. उत्पादन की परिभाषा (Introduction to Production):

परम्परागत अर्थशास्त्री उत्पादन को भौतिक वस्तुओं का निर्माण मानते थे । इन अर्थशास्त्रियों की यह विचारधारा इस वैज्ञानिक तथ्य पर आधारित थी कि मानव न तो किसी पदार्थ का निर्माण कर सकता है और न ही विनाश ।

यह कार्य केवल प्रकृति द्वारा ही सम्भव है । इस प्रकार प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री उत्पादन के अभिप्राय का एक संकुचित दृष्टिकोण प्रस्तुत करते थे जिसे आधुनिक परिप्रेक्ष्य में स्वीकार नहीं किया जा सकता ।

यह सत्य है कि मानव किसी पदार्थ का निर्माण नहीं कर सकता किन्तु मानव अपने प्रयत्नों एवं अन्य साधनों के सहयोग से पदार्थों के रूप, रंग, आकार आदि में परिवर्तन करके उनकी उपयोगिता में वृद्धि अवश्य कर सकता है ।

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उदाहरण के लिए, मिट्टी एक पदार्थ है जिसका निर्माण अथवा विनाश मानव नहीं कर सकता, किन्तु मानव अपने प्रयत्नों एवं अन्य साधनों से जब इस मिट्टी का स्वरूप परिवर्तित करके एक घड़ा बना देता है, तब उपयोगिता का सृजन (Creation of Utility) होता है क्योंकि पदार्थ के परिवर्तित स्वरूप अर्थात् घड़े से मानव आवश्यकता की पूर्ति होती है । सामान्य अर्थों में यही उत्पादन है ।

आधुनिक अर्थशास्त्री उपयोगिता में वृद्धि के स्थान पर मूल्य वृद्धि को उत्पादन मानते हैं । दूसरे शब्दों में, उत्पादन के लिए उपयोगिता के सृजन के साथ-साथ मूल्य वृद्धि का भी होना आवश्यक है ।

यदि किसी कार्य द्वारा किसी वस्तु की उपयोगिता में वृद्धि तो होती है किन्तु उसका विनिमय मूल्य नहीं बढ़ता, तब इस कार्य को उत्पादन नहीं कहा जायेगा । दूसरे शब्दों में, उत्पादन के लिए वस्तु के प्रयोग मूल्य (अर्थात् उपयोगिता) के साथ-साथ वस्तु के विनिमय मूल्य (अर्थात् वस्तु की कीमत) दोनों में वृद्धि होना अनिवार्य है ।

आधुनिक अर्थशास्त्री थॉमस के अनुसार, ”वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि ही उत्पादन है ।”

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इस प्रकार उत्पादन के अभिप्राय का आधुनिक दृष्टिकोण उपयोगिता सृजन एवं मूल्य सृजन दोनों की उपस्थिति एक साथ अनिवार्य मानता है ।

Essay # 2. उत्पादन के साधन (Factors of Production):

एक उत्पादक को किसी वस्तु या सेवा के उत्पादन के लिए कुछ वस्तुओं या सेवाओं की आवश्यकता होती है, इन्हें हम उत्पादन के साधन कहते हैं ।

सामान्यतः उत्पादन के साधनों को चार भागों में बाँटा जाता है:

(1) भूमि

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(2) श्रम

(3) पूँजी

(4) संगठन

आज के वर्तमान औद्योगिक युग में बड़े पैमाने पर उत्पादन करना उत्पादन क्षेत्र की आवश्यकता बन गया है जिसके लिए श्रम-विभाजन और विशिष्टीकरण आवश्यक हैं । यही कारण है कि संगठन करने वाले व्यक्तियों एवं जोखिम और अनिश्चितता सहने वाले व्यक्तियों के अलग-अलग समूह बन गये हैं, जिसके कारण आधुनिक समय में उत्पत्ति के साधनों को पाँच भागों में बाँटा जाने लगा है ।

आधुनिक उत्पादन प्रक्रिया में उत्पत्ति के पाँच साधनों को सम्मिलित किया जाता है:

(1) भूमि (Land):

अर्थशास्त्र में भूमि का अभिप्राय संकुचित न होकर व्यापक दृष्टिकोण पर आधारित है । संकुचित अर्थ में भूमि का अभिप्राय केवल धरती से किया जाता है, किन्तु अर्थशास्त्र में भूमि का अभिप्राय केवल धरती से ही नहीं होता बल्कि प्रकृति के द्वारा प्रदत्त सभी निःशुल्क उपहार जो पृथ्वी के धरातल पर तथा उसके गर्भ में पाये जाते हैं, भूमि की परिभाषा में सम्मिलित किये जाते हैं । खनिज, वन, नदी, पर्वत आदि अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण से भूमि के अंग हैं ।

(2) श्रम (Labour):

श्रम का अर्थ साधारण रूप से केवल शारीरिक श्रमिकों से लिया जाता है, परन्तु अर्थशास्त्र में कोई भी शारीरिक या मानसिक क्रिया यदि वह आर्थिक साधन को प्राप्त करने की दृष्टि से की जाये तो श्रम कहलाती है, परन्तु यह क्रिया नैतिक और कानूनी रूप से मान्य होनी चाहिए ।

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मजदूर, स्वर्णकार, डॉक्टर, प्रवक्ता, इन्जीनियर आदि के कार्य श्रम कहलाते हैं । केवल मनोरंजन की दृष्टि से किए गए श्रम को अर्थशास्त्र में श्रम नहीं कहा जायेगा ।

(3) पूँजी (Capital):

धन का वह भाग भूमि को छोड़कर उत्पादन और अधिक करने में काम आये, पूँजी कहलाता है । पूँजी मानव के पिछले श्रम के फल का भाग होती है जिसे आगे उत्पादन के लिए प्रयुक्त किया जाता है । इसी कारण कुछ अर्थशास्त्रियों ने पूँजी को संचित श्रम भी कहा है । औजार, मशीन, नकद रुपया, यातायात के साधन आदि पूँजी हो सकते हैं ।

(4) संगठन (Organisation):

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एक उद्यमी के कार्यों को प्रमुख रूप से तीन भागों में बाँटा गया है:

a. जोखिम तथा अनिश्चितताओं का सहन (Risk and Uncertainty Bearing):

उत्पादक उत्पादन क्षेत्र की सभी सम्भावित जोखिमों को वहन करता है । लाभ अथवा हानि की अनिश्चितता के लिए उसे सदैव तैयार रहना पड़ता है ।

b. प्रबन्धक तथा नियन्त्रण (Management and Control):

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व्यवसाय का चुनाव, वस्तु का चुनाव, उत्पादन की इकाई का आकार, उत्पादन का पैमाना, उत्पादन स्थान, बिक्री का प्रबन्ध, नये आविष्कार, निर्देशन एवं नियन्त्रण आदि ।

c. समन्वय (Co-Ordination):

कच्चे माल की व्यवस्था, उचित मशीन और औजार, श्रमिकों का उपयोग, प्रतियोगियों से सम्बन्ध, सरकार से सम्बन्ध, आय का वितरण आदि ।

उत्पादन का पैमाना बढ़ जाने के कारण दूसरे तथा तीसरे भागों में उद्यमी के कार्यों को संगठकों द्वारा कराया जाता है । इस व्यवस्था को संगठन कहते हैं । उद्यमी द्वारा इन्हें वेतन दिया जाता है ।

(5) उद्यम (Enterprise):

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उद्यमी केवल पहले वर्ग से सम्बन्धित कार्य अर्थात् जोखिम और अनिश्चितताओं को सहन करता है । प्रतियोगिता के इस युग में जोखिम का तत्व कदम-कदम पर बढ़ जाने के कारण आधुनिक युग में उद्यम का अधिक महत्व हो गया है ।

Essay # 3. उत्पादन साधनों का सापेक्षिक महत्व (Relative Importance of Factors of Production):

उत्पादन उत्पत्ति साधनों के सामूहिक सहयोग और संयोग का परिणाम है । उत्पादन साधन, राष्ट्रीय उत्पादन में अपना योगदान देते हैं, अतः इन्हें इनका उचित प्रतिफल अवश्य मिलना चाहिए । उत्पादन प्रक्रिया में उत्पत्ति के सभी साधनों का एकसमान सहयोग नहीं होता ।

साधनों का सहयोग उत्पादन फलन पर निर्भर करता है । विभिन्न उत्पादन साधनों का उत्पादन में भिन्न-भिन्न सहयोग होने के कारण सभी साधनों को एकसमान प्रतिफल नहीं दिया जा सकता ।

यदि ऐसा सम्भव होता कि एक ही साधन से उत्पादन प्राप्त हो जाता, तो उत्पादन के वितरण की कोई समस्या उत्पन्न नहीं होती किन्तु उत्पादन में अनेक साधनों का सहयोग होने के कारण उत्पत्ति का प्रत्येक साधन उत्पादन में अपने सापेक्षिक सहयोग के अनुसार ही प्रतिफल पाता है ।

भूमि उत्पत्ति का एक अनिवार्य साधन है किन्तु यह निष्क्रिय साधन है, सक्रिय नहीं । क्योंकि भूमि स्वयं कोई उत्पादन नहीं कर सकती जब तक इस पर सक्रिय साधन श्रम की इकाइयों का प्रयोग न हो । भूमि की उर्वरा-शक्ति के रूप में भू-स्वामी को जो पुरस्कार प्राप्त होता है उसे लगान कहा जाता है ।

रिकार्डों के अनुसार लगान एक प्रकार का आधिक्य है जो भूखण्डों की भिन्न-भिन्न उर्वरा-शक्ति के कारण अच्छी उर्वरा-शक्ति वाले भू-स्वामियों को सीमान्त उर्वरता वाले भू-स्वामियों की अपेक्षा प्राप्त होता है । रिकार्डों का विचार था कि केवल भूमि ही लगान उत्पन्न करती है क्योंकि भूमि की पूर्ति को बढ़ाया नहीं जा सकता किन्तु आधुनिक अर्थशास्त्री इस कथन से सहमत नहीं हैं ।

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इनके अनुसार उत्पत्ति का कोई भी दुर्लभ साधन लगान उत्पन्न कर सकता है । आधुनिक दृष्टिकोण के अनुसार भूमि की प्रचुरता आर्थिक समानता का एकमात्र मापदण्ड नहीं हो सकती । उदाहरण के लिए, भारत में भूमि की प्रचुरता होते हुए भी निर्धनता है जबकि सीमित भूमि वाले जापान जैसे देश आर्थिक दृष्टि से अधिक सम्पन्न हैं ।

इसका अभिप्राय यह है कि उत्पादन के लिए साधन की मात्रा से साधन की कार्यकुशलता अत्यधिक महत्वपूर्ण है । यही कारण है कि जापान जैसा छोटा देश अपने श्रम-साधन की उत्तम कार्यकुशलता के कारण विकसित राष्ट्रों की अग्र श्रेणी में खड़ा है । साथ ही साधनों की कार्यकुशलता में भिन्नता के कारण ही उत्पादन में विषमता उत्पन्न होती है ।

भिन्न-भिन्न उत्पादन क्षेत्रों में उत्पत्ति के विभिन्न साधनों का भिन्न-भिन्न सापेक्षिक महत्व है । किसी उत्पादन क्षेत्र में श्रम तुलनात्मक रूप से अधिक प्रधान है तो कहीं पूँजी की प्रधानता है किन्तु आधुनिक औद्योगिक युग में श्रम और पूँजी दोनों का सहयोग आवश्यक है क्योंकि श्रम को अधिक कार्य-कुशल बनाने की दृष्टि से पूँजी का योगदान आवश्यक है ।

तीव्र औद्योगीकरण, नई-नई तकनीकों के आविष्कार आदि के कारण औद्योगिक क्षेत्र में पूँजी का महत्व बहुत बढ़ गया है । साथ ही उत्पादन प्रक्रिया इतनी जटिल हो गयी है कि इसके सफल संचालन के लिए एक कुशल संगठन एवं निर्देशन की आवश्यकता होती है इसी कारण औद्योगिक क्षेत्र में प्रबन्ध एवं नियन्त्रण योग्यता का महत्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है ।

आधुनिक उत्पादन प्रक्रिया में जोखिम और अनिश्चितता का घटक अवश्य उपस्थित रहता है । ऐसे जोखिम एवं अनिश्चितता के वातावरण में उत्पादन प्रक्रिया को प्रारम्भ करना उद्यमियों की अनुपस्थिति में असम्भव है ।

उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि आधुनिक युग में उत्पादन प्रक्रिया को सफलतापूर्वक जारी रखने के लिए उत्पत्ति के प्रत्येक साधन – भूमि, श्रम, पूँजी, संगठन, एवं उद्यम का सहयोग आवश्यक है ।

Essay # 4. उत्पादन की मात्रा को प्रभावित करने वाले तत्व (Factors Affecting the Volume of Production):

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प्रत्येक अर्थव्यवस्था का राष्ट्रीय आय स्तर, सामान्य जन-जीवन स्तर एवं सामाजिक कल्याण सभी देश के उत्पादन की मात्रा पर निर्भर करते हैं । अर्थव्यवस्था के आर्थिक विकास के लिए उत्पादन-कुशलता में वृद्धि करना अनिवार्य है ।

उत्पादन-कुशलता का अर्थ है एक निश्चित समय में उत्पादन की अधिक मात्रा प्राप्त करना एवं उत्पादन की किस्म को सुधारना । एक निश्चित समयावधि (सामान्यतः एक वर्ष) में देश में उत्पन्न सेवाओं और वस्तुओं की कुल मात्रा को उत्पादन कहा जाता है ।

उत्पादन की मात्रा को निम्नलिखित तत्व प्रभावित करते हैं:

A. आन्तरिक तत्व (Internal Factors)

B. बाह्य तत्व (External Factors) |

A. आन्तरिक तत्व (Internal Factors):

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उत्पादन की मात्रा को प्रभावित करने वाले आन्तरिक तत्वों में दो तत्वों को सम्मिलित किया जाता है:

(i) उत्पत्ति साधनों की कार्यकुशलता ।

(ii) उत्पत्ति के साधनों का प्रयोग अनुपात ।

(i) उत्पत्ति साधनों की कार्यकुशलता:

उत्पत्ति के साधन जितने अधिक कार्यकुशल होंगे उतना ही उत्पादन विस्तार किया जा सकता है । उत्पादन केवल उत्पत्ति के साधनों के आकार पर ही निर्भर नहीं करता, बल्कि इनकी कार्यकुशलता पर निर्भर करता है । साधन के अधिक कार्यकुशल होने पर कम लागत पर अधिक उत्पादन किया जा सकता है ।

साधन में कार्यकुशलता में वृद्धि के लिए आवश्यक है कि साधन को उसकी योग्यतानुसार कार्य दिया जाये और श्रम-विभाजन एवं विशिष्टीकरण का सहारा लेकर उसकी कार्यकुशलता में वृद्धि की जाय ।

(ii) उत्पत्ति के साधनों का प्रयोग अनुपात:

साथ ही उत्पत्ति के साधनों को सही अनुपात में प्रयोग करके भी कार्यकुशलता एवं उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है । उत्पत्ति के साधनों को सही अनुपात में प्रयोग न करके कभी-कभी बहुत उपयोगी एवं कार्यकुशल साधन भी व्यर्थ चले जाते हैं ।

B. बाह्य तत्व (External Factors):

(i) प्राकृतिक तत्व (Natural Factors):

उत्पादन की मात्रा देश की जलवायु, भौगोलिक परिस्थिति, भूमि एवं भूमि सम्पदा की उपलब्धि आदि प्राकृतिक तत्वों से भी प्रभावित होती है । अच्छी उर्वरा-शक्ति वाली भूमि यदि प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है तब प्रकृति का सहयोग रहते हुए (समय पर वर्षा आदि) उत्पादन में वृद्धि की जाती है ।

(ii) तकनीकी प्रगति एवं अनुसन्धान (Progress and Research Technological):

देश का वैज्ञानिक एवं तकनीकी ज्ञान स्तर उत्पादन की मात्रा को प्रभावित करता है । देश में वैज्ञानिक एवं तकनीकी ज्ञान का जितना अधिक विस्तार होगा, उतना ही नई-नई उत्पादन तकनीकों का प्रयोग करके उत्पादन मात्रा में वृद्धि की जा सकती है ।

(iii) साख एवं बैंकिंग सुविधाएँ (Credit and Banking Facilities):

आधुनिक उत्पादन प्रणाली को संचालित एवं पोषित करने के लिए वित्त की पर्याप्त एवं सहज उपलब्धता आवश्यक होती है । उत्पादन की मात्रा एवं कुशलता में वृद्धि के लिए यह आवश्यक है कि उद्यमियों को कम ब्याज दर पर एवं आसान शर्तों पर पूँजी उपलब्ध हो । देश में साख तथा बैंकिंग सुविधाओं का जैसे-जैसे विस्तार होता जाता है वैसे-वैसे उत्पादन की मात्रा में वृद्धि होती जाती है ।

(iv) परिवहन एवं संचार (Transport and Communication):

अर्थव्यवस्था में परिवहन एवं संचार के माध्यम जैसे-जैसे विकसित होते जाते हैं देश में श्रम और पूँजी की गतिशीलता बढ़ती जाती है । इसके अतिरिक्त परिवहन एवं संचार माध्यमों के विकास से उद्योगों को कच्चे माल की नियमित पूर्ति एवं अच्छी विपणन सुविधाएँ प्राप्त होती हैं । उद्योगों को नियमित कच्चे माल की पूर्ति एवं विपणन सुविधाओं का उत्पादन वृद्धि पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है ।

(v) सरकार की नीतियाँ (Government Policies):

औद्योगीकरण को प्रोत्साहित करने वाली सरकार की नीति उत्पादन की मात्रा एवं कुशलता में वृद्धि करती है । इसके विपरीत, यदि सरकारी नीति उद्यमियों को हतोत्साहित करने की हो तब उत्पादन का आकार कम होता है ।

(vi) राजनीतिक दशाएँ (Political Conditions):

देश की राजनीतिक दशाएँ उत्पादन के आकार एवं इसकी संरचना को प्रभावित करती हैं । देश में शान्ति और सुरक्षा होने पर एवं राजनीतिक स्थिरता होने पर उत्पादन की मात्रा और कुशलता में वृद्धि होती है । इसके विपरीत औद्योगिक अशान्ति होने पर, हड़ताल, तालाबन्दी, घेराव, धरना आदि दशाओं में उत्पादन स्तर में कमी होती है ।